Monday, February 28, 2022

शब के जाम का वो एहतिशाम ही तो थी

 URDU ~ POETRY__Draft  12:08 AM · Mar 1, 2022Twitter Web App @kavishala

11:58 PM · Feb 28, 2022Twitter Web App @Rekhta









छालों पे धूप के मरहम वो शाम ही तो थी उस शब के जाम का वो एहतिशाम ही तो थी शायर था वो बेनाम सा था उसके पास क्या लिक्खी हर एक सांस तिरे नाम ही तो थी बदनाम था वो इश्क़ में हर बात थी खुली फूलों से शनासाई खुले आम ही तो थी


इस जिंस-ए-उल्फ़त ने दिवाना जिसे किया उसने करी ये ज़िंदगी नीलाम ही तो थी


~ ज़ोया गौतम ' निहां ' 

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  • एहतिशाम >magnificence, pomp, ostentation, glory, grandeur

पाप गंगा में जा के धोते हैं

 6:10 AM · Mar 1, 2022Twitter Web App  @Rekhta

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चैन दिल का यूँ जब भी खोते हैं वो तो हम को ही ले डुबोते हैं


दर्द शबनम यूं ही नहीं होता फूल औरों के ग़म में रोते हैं


नींद ऐसी कहीं न आती है मस्त फ़ुटपाथ पे ही सोते हैं कुछ खरोंचें अभी भी ताज़ा हैं लोग फिर क्यूँ बबूल बोते हैं काम धोबन के बस के बाहर था पाप गंगा में जा के धोते हैं


~ ज़ोया गौतम ' निहां ' 

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पत्थर की ही लकीर है

 2:10 PM · Feb 28, 2022Twitter Web App



वो पेशानी भी तो होगी किसी ख़ुद्दार की

लिखा है उसपे जो पत्थर की ही लकीर है

(पेशानी> forehead)

~ ज़ोया गौतम ' निहां ' 

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Sunday, February 27, 2022

झिलमिलाता हुआ तारा निकला


 6:42 PM · Feb 27, 2022Twitter Web App /published



मर्ज़ का कोई न चारा निकला कोई हमदम न हमारा निकला


ग़म के बादल बिखर ही जाएँगे

झिलमिलाता हुआ तारा निकला बातों बातों में दिल को तोड़े है मिरे दिल का जो सहारा निकला वो इक ख़याल मुहब्बत का है जो मुहब्बत से भी प्यारा निकला

क्या कहूं क्या न कहूं मैं दिल को ये भी तो इश्क़ का मारा निकला

जिसको कहते थे वो समंदर है स्वाद उस अश्क़ का खारा निकला

~ ज़ोया गौतम ' निहां ' 

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Saturday, February 26, 2022

मज़हब

 किसी चंपा किसी नरगिस का मज़हब ग़र हुआ होता

ज़रा सोचो तो बाग़ों का भी क्या मंज़र हुआ होता
हवाओं का कहीं कोई धरम होता तो क्या होता मिरे सीने में भी साँसों का क्या बलवा हुआ होता


ये सूरज चाँद भी दीनी तक़ाबुल में जो टकराते गहन ही में उलझ जाते न उजियारा हुआ होता

क्या बारिश की कभी कोई कहीं पर ज़ात होती है जो होती तो ज़मीं की प्यास का फिर क्या हुआ होता



( दीनी तक़ाबुल > religious encounter / गहन >eclipse )


~ ज़ोया गौतम ' निहां ' 

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फिर चाँदनी में देखिए शबनम को फूल पर

 URDU ~ POETRY__Draft











फूलों के नहीं पैरहन ये कहता फिरे है उसकी ज़ुबाँ पे भी कहाँ कोई लिबास है फिर चाँदनी में देखिए शबनम को फूल पर गौहर तो वो नहीं अगरचे बात ख़ास है



~ ज़ोया गौतम ' निहां ' 

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Friday, February 25, 2022

चराग़ बुझ रहे हैं अंधेरों के शहर में #UkraineInvasion


URDU ~ POETRY__Draft   #no_war








                                                                                         ( photo courtsey twitter )




#UkraineInvasion

जो अनसुनी करी हैं यूँ सूरज की दस्तकें चराग़ बुझ रहे हैं अंधेरों के शहर में जीने के लिए हो चुकी ज़मीन बहुत तंग दो गज़ की ज़मीनें हैं अंधेरों के शहर में आंसू हैं मगर कोई नहीं पोंछने वाला ये किसकी कराहें हैं अंधेरों के शहर में


सुनसान रास्ते हैं बेआवाज़ हैं सड़कें राहें नहीं मिलती हैं अंधेरों के शहर में गौहर था मगर ख़ाक ही में मिल गया है अब सूखा हुआ है अश्क़ अंधेरों के शहर में


~ ज़ोया गौतम ' निहां ' 

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URDU ~ POETRY__Draft

 10:34 PM · Feb 24, 2022Twitter Web App  














अभी ज़िंदा तो हैं हम तुम चलो कुछ दोस्ती कर लें किसी मुर्दे की यारी का कभी चर्चा नहीं होता


~ ज़ोया गौतम ' निहां ' 

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