Sunday, March 13, 2022

तिरा ग़म-ख़्वार हो जाना

 











कभी देखा है तुम को भी गुलिस्तां में गुलों के संग किया है याद फूलों ने तिरा ग़म-ख़्वार हो जाना


वो फागुन का ही था मौसम थे कुछ हैरत में भी बादल खुली काली घनी ज़ुल्फ़ों से फिर बौछार हो जाना


~ ज़ोया गौतम ' निहां ' 

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..namastey!~