Tuesday, March 15, 2022

साहिल पे बनाता है घर रेत का कोई

 

1:50 PM · Mar 15, 2022Twitter Web App  

@Rekhta








साहिल पे बनाता है घर रेत का कोई बन बन के बिखरना तो आदत है ख़्वाब की


आंखें हैं नरगिसी और चम्पई हैं पैर मिलती नहीं मिसाल है ऐसे गुलाब की


छुपना पड़ा है चाँद को बादल की ओट में कुछ बात है अलग सी मिरे माहताब की

इक याद है माज़ी की बोतल में बंद है रंगत ही तो अलग है पुरानी शराब की


~ ज़ोया गौतम ' निहां ' 

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