ये फ़ुर्क़त के लम्हे जगाते बहुत हैं
ख़यालों से शब् को सजाते बहुत हैं
है मर्ज़ ए ग़म ए दिल करें तो करें क्या
फ़क़ीरों के नुस्ख़े बताते बहुत हैं
ये तन्हाई मेरी ये मेरे फ़साने
ये रातों में जुगनू जलाते बहुत हैं
वो ख़्वाबों में मेरे जो आते नहीं हैं
मुझे ख़्वाब ऐसे सताते बहुत हैं
~ G.Mukharji /Copyright 2026
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..namastey!~