Sunday, May 10, 2026

ये फ़ुर्क़त के लम्हे जगाते बहुत हैं

 ये  फ़ुर्क़त  के लम्हे जगाते बहुत हैं

तेरे ग़म से शब्  को सजाते बहुत हैं


है मर्ज़ ए  ग़म ए दिल करें तो करें क्या 

फ़क़ीरों के नुस्ख़े बताते बहुत हैं  


ये तन्हाई मेरी ये मेरे फ़साने 

ये रातों में जुगनू जलाते बहुत हैं 


वो ख़्वाबों में मेरे जो आते नहीं हैं 

मुझे ख़्वाब ऐसे सताते बहुत हैं

 

ये बादल भी शायद हैं बिरहा के मारे

 ये सावन में आंसू बहाते बहुत हैं ~


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